महर्षि योगानंद परमहंस जी महाराज

आचार्य तथा संस्थापक(अखिल राष्ट्रीय संतमत सत्संग)

ईश्वर ने अपनी बातों को लोगों तक पहुंचाने के लिए, उन्हें सही रास्ते पर लाने के लिए, व्यक्ति का विकास कैसे हो, उसके चिंतन, शरीर, धन, ज्ञान का विकास कैसे हो, उसके लिए एक प्रतिनिधि परंपरा का प्रारंभ किया, यही संत परंपरा है।
महर्षि योगानंद परमहंस जी महाराज ऐसे ही संतों में से एक हैं 1959 में भारत के बिहार क्षेत्र में जन्में गुरुदेव एक प्रतिभाशाली बालक थे। वह मात्र चार साल की उम्र से ही एक प्राचीन संस्कृत ग्रंथ श्रीमद्भग्वद्गीता का पाठ करने में सक्षम हो चुके थे , और अकसर लोग उन्हें ध्यान अवस्था में पाते थे। अगर स्कूली शिक्षा की बात करें तो उन्होंने वैदिक साहित्य और भौतिकी-शास्त्र दोनों में डिग्री हासिल की।

महाराज जी का लक्ष्य

उन्होंने समाज कल्याण के लिए अपने अध्यात्मिक ज्ञान से लोगों को जागरूक करना और लोगों को सही दिशा दिखाना ही अपना लक्ष्य बनाया।


महाराज जी की वाणी

जिस दिन आपके दुर्व्यव्हार के कारण मां-बाप की आंखें में आंसू आए, तो याद रखिए, उसी दिन आपका सारा धर्म-करम आंसुओं में बह गया.

भगवान से ना डरो तो चलेगा; लेकिन कर्मों से जरूर डरना; क्यूंकि किये हुए कर्मों का फल तो भगवान को भी भोगना पड़ा था

नथनी दीनी यार ने तो चिंतन बारम्बार! नाक दिया करतार ने, उसे दिया बिसार

दीपक बोलता नहीं, उसका प्रकाश परिचय देता। ठीक उसी प्रकार अपने बारे में कुछ न बोलें, अच्छे कर्म करते रहें, वही आपका परिचय देंगे।

झूठे इंसान की ऊंची आवाज सच्चे इंसान को खामोश कर देती है; लेकिन सच्चे इंसान की खामोशी झूठी इंसान की बुनियाद हिला देती है।

मानव-देह ही वह एकमात्र रथ है, जिसपर सवार होकर आत्मा परमात्मा तक पहुँच सकती है।

फोटो गॅलरी

पूज्य बाबा के प्रिय शिष्य उनको प्रणाम करते हुए

महाराज जी के प्रिय शिष्य गुरु प्रसाद मात्र 12 साल की उम्र से ही पूज्य बाबा के साथ सेवा में हैं। गुरु प्रसाद महर्षि योग आश्रम (बैजनाथपुर) के व्यवस्थापक भी हैं।

पूज्य बाबा से आशीर्वाद लेने पहुंचे देश के राजनेतागण

महाराज जी से आशीर्वाद लेने पहुंचे कुछ राजनेता जिनमें बिहार के उपमुख्यमंत्री तारकेश्वर प्रसाद, कला-संस्कृति मंत्री आलोक रंजन तथा स्थानीय विधायक भी शामिल थे।

बिहार के उपमुख्यमंत्री तारकेश्वर प्रसाद को अंगवस्त्र से सम्मानित करते हुए पूज्य बाबा

अखिल राष्ट्रीय संतमत् सत्संग के 110वां महाधिवेशन के आयोजन स्थल कंचनपुर, जिला - सहरसा में आयोजित कार्यक्रम में बिहार के माननीय उपमुख्यमंत्री तारकेश्वर प्रसाद को अंगवस्त्र से सम्मानित करते हुए पूज्य बाबा।

बिहार के कला-संस्कृति मंत्री आलोक रंजन को अंगवस्त्र से सम्मानित करते हुए पूज्य बाबा

अखिल राष्ट्रीय के 110वां महाधिवेशन के आयोजन स्थल कंचनपुर, जिला - सहरसा में आयोजित कार्यक्रम में बिहार के माननीय कला-संस्कृति मंत्री आलोक रंजन को अंगवस्त्र से सम्मानित करते हुए पूज्य बाबा।

पूज्य बाबा के साथ मंच पर उपस्थित स्वामी आशुतोषानन्द गिरी जी महाराज

अखिल राष्ट्रीय संतमत् सत्संग के 110वां महाधिवेशन में निमंत्रण स्वरूप आये हुए कैलश मठ काशी (वाराणसी) के महामंडलेश्वर स्वामी आशुतोषानन्द गिरी जी महराज जो अनेकों बार शास्त्रार्थ प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक से सम्मानित हुए और लोकप्रिय राजनेता के रूप में पूर्वांचल बोर्ड के चेयरमैन भी हैं।

अखिल राष्ट्रीय संतमत् सत्संग महासभा के अध्यक्ष अरविन्द कुमार पूज्य बाबा को माल्यार्पित करते हुए

अखिल राष्ट्रीय संतमत् सत्संग महासभा के अध्यक्ष अरविन्द कुमार पूज्य बाबा को माल्यार्पित करते हुए।

पूज्य बाबा का प्रवचन सुनते हुए श्रोतागण

अखिल राष्ट्रीय संतमत् सत्संग 110वां महाधिवेशन स्थल कंचनपुर में उपस्थित श्रोतागण का दृश्य।

महाराज जी की रचनाएँ

साधक संजीवनी

जिस दिन आपके दुर्व्यव्हार के कारण मां-बाप की आंखें में आंसू आए, तो याद रखिए, उसी दिन आपका सारा धर्म-करम आंसुओं में बह गया

दु:खों से निवृत्ति कैसे?

भगवान से ना डरो तो चलेगा; लेकिन कर्मों से जरूर डरना; क्यूंकि किये हुए कर्मों का फल तो भगवान को भी भोगना पड़ा था

मुक्ति कैसे?

नथनी दीनी यार ने तो चिंतन बारम्बार! नाक दिया करतार ने, उसे दिया बिसार

विस्तृत परिचय

महर्षि योगनन्द परमहंस जी महाराज का जन्म सहरसा जिले के मोहम्मदपुर नौहट्टा गाँव में 03 फरवरी 1959 को हुआ था। उनका शुरुआती शिक्षा अपने गाँव नौहट्टा में ही हुआ। दस से पंद्रह वर्ष की उम्र में उच्च शिक्षा ग्रहण करने के लिए अपने गाँव से बाहर निकले। उन्होंने डबल एम.ए (भौतिकी-शास्त्र) की डिग्री हासिल की। इन्होंने महर्षि मेंही परमहंस जी महाराज (कुप्पाघाट, भागलपुर) से गुरुदीक्षा ली और सन्यास धारण किया। उनके गुरु महाराज के शरीर त्यागने के बाद इन्होंने गुरु महाराज के हृदय महर्षि शाही स्वामी जी महाराज के साथ संतमत् का प्रचार प्रसार करने लगे। फिर महर्षि शाही स्वामी जी के शरीर त्यागने के बाद उनके कहे हुए आदर्शों पर अपने साथ साधु संतों के साथ संतमत् का प्रचार प्रसार करने लगे। वर्तमान में अखिल राष्ट्रीय संतमत् सत्संग महासभा के आचार्य के रूप में विद्यमान हैं ।

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